Tuesday, August 11, 2009

ज्ञात

धी शक्ति उन्नंतदाका अंदु ज्ञेय वस्तुवुलुंटायि. अदि लेनिचो अवी उंडवु
ज्ञात सर्वकालाललोनू ज्ञातये
कनुक द्वैतानिकि अस्तित्वं लेदु!

-- श्री शंकर उवाच नुंचि

ना विवरण:
"धी शक्ति" जाग्रत्, स्वप्न अवस्थल्लो मात्रमे उंटुंदि. सुषुप्ति लो उंडदु.
1. जग्रदावस्थलॊ इंद्रियाल द्वारा बयटिकि प्रसरिंचि बाह्य ज्ञेय वस्तुवुलनि प्रकाशवंतं चेस्तुंदि
2. स्वप्न अवस्थलो इंद्रियालन्नी मूयबडि उंडटं वल्ल अंतरंगंलो ज्ञेय वस्तुवुलनि सृष्टि चेस्तुंदि
3. सुषुप्ति लो धी शक्ति लेक पोवडं वल्ल ज्ञेय वस्तुवुलु उंडवु

कानि ई मूडु अवस्थल्लोनू ज्ञात उंटाडु. (एकं एव अद्वितीयं)
"धीशक्ति", "ज्ञेय वस्तुवुलु" ऒक दानि मिद इंकॊकटि आधार पडि उंडगा, ज्ञात सर्वाधारमैन आत्म गा, निराधारुडैन ब्रह्मगा सर्वकालाललोनू ज्ञातगा उंटाडु.

श्री शंकरुलु इंकॊक संदर्भं लो इला अंटारु
"आत्म ज्ञेय विषयं कादु. अंदु बहुत्व दोषं लेदु. कनुक अदि ऎवरिचेतनैना अंगीकरिंपबडिनदी, निराकरिंपबडिनदी कादु."
मरॊक संदर्भं लो:
"देनि ज्ञानं वलन इक ज्ञेय विषयं मिगलदो, देनि आनंदं वलन इक वांछनीयमैन आनंदं उंडदो, एदि प्रापिंचुट वलन इक प्राप्यमे उंडदो, दानिनि ब्रह्ममनि तॆलुसुको"

ओं तत्सत्

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